शुक्रवार, 6 नवम्बर 2026 |
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement

सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला: अब हिरासत में लेते ही शुरू होगी 24 घंटे की समय-सीमा, औपचारिक गिरफ्तारी का नहीं करना होगा इंतजार

Triangle News

14 minutes ago 3 views
सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला: अब हिरासत में लेते ही शुरू होगी 24 घंटे की समय-सीमा, औपचारिक गिरफ्तारी का नहीं करना होगा इंतजार

मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की संवैधानिक समय-सीमा पर शीर्ष अदालत की स्पष्ट टिप्पणी, हिरासत और गिरफ्तारी के बीच कृत्रिम अंतर को बताया असंवैधानिक

विशेष रिपोर्ट: अनुराग सिंह बिष्ट

राजधानी/नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने के लिए निर्धारित 24 घंटे की संवैधानिक समय-सीमा उसकी वास्तविक हिरासत के क्षण से शुरू होगी। पुलिस द्वारा औपचारिक रूप से गिरफ्तारी दर्ज किए जाने के समय से इसकी गणना नहीं की जाएगी।

न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां और न्यायमूर्ति अतुल एस. चांदुरकर की पीठ ने कहा कि जब किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता प्रभावी रूप से सीमित कर दी जाती है और उसे पुलिस के नियंत्रण में ले लिया जाता है, तभी से 24 घंटे की अवधि की गणना शुरू हो जाएगी।

हिरासत और औपचारिक गिरफ्तारी में कृत्रिम अंतर स्वीकार्य नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 22(2) की व्याख्या करते हुए कहा कि हिरासत में लेने और औपचारिक गिरफ्तारी के बीच ऐसा कृत्रिम अंतर नहीं किया जा सकता, जिससे पुलिस को किसी व्यक्ति को लंबे समय तक अपने नियंत्रण में रखने के बावजूद गिरफ्तारी दर्ज करने में देरी करने की छूट मिल जाए।

अदालत के अनुसार, औपचारिक गिरफ्तारी से पहले पूछताछ, जांच, तलाशी या जब्ती के नाम पर हिरासत में बिताए गए समय को 24 घंटे की गणना से अलग नहीं रखा जा सकता।

केवल यात्रा का समय होगा अपवाद

पीठ ने स्पष्ट किया कि हिरासत के स्थान से मजिस्ट्रेट की अदालत तक पहुंचने में लगने वाला आवश्यक यात्रा समय ही 24 घंटे की गणना से बाहर रखा जा सकता है। इसके अलावा जांच या अन्य प्रक्रियाओं के नाम पर हिरासत की अवधि को अलग करने की अनुमति नहीं है।

मजिस्ट्रेट को दर्ज करना होगा हिरासत का वास्तविक समय

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए जाने पर व्यक्ति को हिरासत में लिए जाने की वास्तविक तारीख और समय दर्ज किया जाना चाहिए। मजिस्ट्रेट को यह भी जांचना होगा कि संवैधानिक समय-सीमा का पालन हुआ है या नहीं।

यदि किसी व्यक्ति को निर्धारित अवधि से अधिक समय तक मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए बिना हिरासत में रखा जाता है, तो उसे तत्काल रिहा किया जाना होगा। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि 24 घंटे की सीमा के भीतर भी हिरासत की अवधि परिस्थितियों के अनुसार उचित होनी चाहिए।

किस मामले में आया फैसला?

यह फैसला सुजीत दास बनाम भारत संघ मामले में आया, जिसमें चार लोगों ने त्रिपुरा हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें NDPS अधिनियम के तहत दर्ज मामले में उनकी जमानत याचिका खारिज की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने मामले के तथ्यों के आधार पर पाया कि आरोपियों को पहले हिरासत में लिया गया था, जबकि औपचारिक गिरफ्तारी बाद में दर्ज की गई। अदालत ने संवैधानिक समय-सीमा के उल्लंघन को देखते हुए उनकी तत्काल रिहाई का आदेश दिया।

यह फैसला पुलिस हिरासत और गिरफ्तारी की प्रक्रिया में संवैधानिक अधिकारों तथा न्यायिक निगरानी के महत्व को रेखांकित करता है।

Triangle News Lucknow — सच के साथ, सबसे आगे…

शेयर करें

विज्ञापन

Advertisement
Advertisement
Advertisement

संबंधित खबरें

114
पेज 3 / 19