बुधवार, 21 अक्टूबर 2026 |

किडनी की बीमारी से दिल की कार्यक्षमता पर पड़ सकता है असर, जानें हार्ट फेलियर का खतरा क्यों बढ़ता है

Triangle News

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किडनी की बीमारी से दिल की कार्यक्षमता पर पड़ सकता है असर, जानें हार्ट फेलियर का खतरा क्यों बढ़ता है

किडनी और दिल शरीर के दो महत्वपूर्ण अंग हैं, जो अलग-अलग काम करने के बावजूद एक-दूसरे की कार्यक्षमता पर निर्भर रहते हैं। किडनी खून से अपशिष्ट पदार्थों और अतिरिक्त पानी को बाहर निकालने में मदद करती है, जबकि दिल पूरे शरीर में रक्त पहुंचाने का काम करता है। ऐसे में जब इन दोनों में से किसी एक अंग की कार्यक्षमता प्रभावित होती है, तो इसका असर दूसरे पर भी पड़ सकता है।

किडनी की बीमारी होने पर शरीर में नमक और तरल पदार्थ जमा होने लग सकते हैं। इससे ब्लड प्रेशर बढ़ने और दिल पर अतिरिक्त दबाव पड़ने का खतरा रहता है। वहीं, दिल की पंपिंग क्षमता कमजोर होने पर किडनी तक पर्याप्त मात्रा में रक्त नहीं पहुंच पाता, जिससे उसकी कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है। यही वजह है कि किडनी की बीमारी और हार्ट फेलियर के बीच गहरा संबंध माना जाता है।

किडनी और दिल के बीच क्या है संबंध?

दिल और किडनी शरीर में रक्त संचार तथा तरल पदार्थों का संतुलन बनाए रखने में मिलकर काम करते हैं। दिल रक्त को पंप करके शरीर के सभी अंगों तक पहुंचाता है, जबकि किडनी रक्त को फिल्टर करके अतिरिक्त पानी, सोडियम और अपशिष्ट पदार्थों को पेशाब के जरिए बाहर निकालती है।

जब किडनी ठीक से काम नहीं करती, तो शरीर में तरल पदार्थ बढ़ने से ब्लड प्रेशर प्रभावित हो सकता है। इससे दिल को रक्त पंप करने के लिए अधिक मेहनत करनी पड़ सकती है। दूसरी ओर, दिल कमजोर होने पर किडनी में रक्त का प्रवाह कम हो सकता है और शरीर में तरल पदार्थों का संतुलन बिगड़ सकता है।

इस तरह दोनों अंगों की समस्याएं एक-दूसरे को बढ़ा सकती हैं। इसलिए किडनी और हृदय की सेहत को एक साथ ध्यान में रखना जरूरी है।

किडनी की बीमारी में क्यों बढ़ जाता है हाई ब्लड प्रेशर का खतरा?

किडनी की बीमारी और हाई ब्लड प्रेशर के बीच दोतरफा संबंध होता है। लंबे समय तक रक्तचाप बढ़ा रहने से किडनी की छोटी रक्त वाहिकाओं और रक्त को फिल्टर करने वाली संरचनाओं को नुकसान पहुंच सकता है। इससे किडनी की छानने की क्षमता धीरे-धीरे कम हो सकती है।

दूसरी तरफ, किडनी की कार्यक्षमता प्रभावित होने पर शरीर से अतिरिक्त सोडियम और पानी बाहर निकालने में परेशानी होती है। इसके कारण शरीर में तरल पदार्थ की मात्रा बढ़ सकती है और ब्लड प्रेशर ऊपर जा सकता है।

किडनी रक्तचाप को नियंत्रित करने वाले हार्मोनल तंत्र में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। कुछ परिस्थितियों में यह तंत्र अधिक सक्रिय होने से रक्त वाहिकाएं संकरी हो सकती हैं, जिससे रक्तचाप बढ़ने लगता है।

इससे एक ऐसा चक्र बन सकता है, जिसमें हाई ब्लड प्रेशर किडनी को और नुकसान पहुंचाता है, जबकि खराब किडनी रक्तचाप को नियंत्रित करना कठिन बना देती है। लंबे समय तक यह स्थिति बने रहने पर दिल की बीमारियों का जोखिम भी बढ़ सकता है।

किडनी डिजीज और हार्ट फेलियर में क्या है कनेक्शन?

हार्ट फेलियर ऐसी स्थिति है, जिसमें दिल शरीर की जरूरत के मुताबिक पर्याप्त रक्त पंप नहीं कर पाता या ऐसा करने के लिए उसे अधिक दबाव के साथ काम करना पड़ता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि दिल ने पूरी तरह काम करना बंद कर दिया है।

किडनी की पुरानी बीमारी यानी क्रॉनिक किडनी डिजीज (CKD) से पीड़ित लोगों में हाई ब्लड प्रेशर, शरीर में अतिरिक्त तरल पदार्थ, रक्त वाहिकाओं को नुकसान और मेटाबॉलिज्म में बदलाव जैसे कारक दिल पर दबाव बढ़ा सकते हैं।

वहीं, हार्ट फेलियर होने पर किडनी तक पहुंचने वाला रक्त कम हो सकता है। इसके अलावा, दिल की कार्यक्षमता कमजोर होने से शरीर में रक्त और तरल पदार्थों का दबाव बदल सकता है। इससे किडनी की फिल्टर करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।

यदि दोनों अंगों की समस्याएं एक साथ मौजूद हों, तो शरीर में तरल पदार्थ जमा होने, ब्लड प्रेशर नियंत्रित करने में परेशानी और अस्पताल में भर्ती होने का जोखिम बढ़ सकता है। हालांकि, हर किडनी मरीज को हार्ट फेलियर होगा, ऐसा जरूरी नहीं है। जोखिम व्यक्ति की बीमारी की गंभीरता और अन्य स्वास्थ्य स्थितियों पर निर्भर करता है।

किडनी और दिल को स्वस्थ रखने के लिए क्या करें?

किडनी और हृदय से जुड़ी समस्याओं का जोखिम कम करने के लिए कुछ जरूरी सावधानियां अपनाई जा सकती हैं।

  • ब्लड प्रेशर नियंत्रित रखें: नियमित रूप से रक्तचाप की जांच कराएं और डॉक्टर की सलाह के अनुसार उपचार जारी रखें।

  • डायबिटीज पर ध्यान दें: ब्लड शुगर का स्तर नियंत्रित रखना किडनी और दिल, दोनों की सेहत के लिए महत्वपूर्ण है।

  • खाने में नमक सीमित रखें: अधिक नमक शरीर में पानी जमा होने और ब्लड प्रेशर बढ़ने का कारण बन सकता है।

  • दवाएं डॉक्टर की सलाह से लें: दर्द निवारक दवाओं सहित कुछ दवाएं किडनी को नुकसान पहुंचा सकती हैं। कोई भी दवा लंबे समय तक लेने से पहले चिकित्सकीय सलाह लें।

  • नियमित जांच कराएं: जरूरत के अनुसार डॉक्टर किडनी फंक्शन टेस्ट, पेशाब में एल्ब्यूमिन की जांच और हृदय संबंधी परीक्षण कराने की सलाह दे सकते हैं।

  • तरल पदार्थों को लेकर सावधानी बरतें: किडनी की गंभीर बीमारी या हार्ट फेलियर में पानी की मात्रा सीमित करने की जरूरत कुछ मरीजों को हो सकती है। ऐसा केवल डॉक्टर की सलाह के अनुसार करें।

किन लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए?

पैरों या टखनों में सूजन, बिना स्पष्ट कारण वजन तेजी से बढ़ना, सांस फूलना, असामान्य थकान और पेशाब की मात्रा में बदलाव जैसे लक्षणों पर ध्यान देना चाहिए। ये कई अलग-अलग स्थितियों के संकेत हो सकते हैं और केवल इनके आधार पर किडनी या दिल की बीमारी की पुष्टि नहीं की जा सकती।

यदि सांस अचानक बहुत ज्यादा फूलने लगे, सीने में दर्द हो या आराम करते समय भी सांस लेने में गंभीर परेशानी हो, तो तुरंत आपातकालीन चिकित्सा सहायता लें।

निष्कर्ष: किडनी और दिल की सेहत एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई है। किडनी की बीमारी से ब्लड प्रेशर और दिल पर दबाव बढ़ सकता है, जबकि हार्ट फेलियर किडनी की कार्यक्षमता को प्रभावित कर सकता है। समय पर जांच, रक्तचाप और डायबिटीज पर नियंत्रण तथा डॉक्टर की सलाह के अनुसार उपचार से इन जटिलताओं के जोखिम को कम करने में मदद मिल सकती है।

डिस्क्लेमर: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य संबंधी जानकारी के लिए है। किसी भी बीमारी के निदान या उपचार के लिए योग्य चिकित्सक से परामर्श लें।

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