मुस्लिम दलित जातियों के आरक्षण समेत पांच मांगों को लेकर राष्ट्रीय उलेमा काउंसिल ने उठाई आवाज, प्रदेशव्यापी आंदोलन की चेतावनी
Triangle News
रिपोर्ट: संजय मुखी
राजधानी/लखनऊ, 29 अक्टूबर 2026। राष्ट्रीय उलेमा काउंसिल (RUC) के प्रदेश अध्यक्ष एवं युवा अध्यक्ष नुरूल हूदा ने प्रेस प्रतिनिधियों से बातचीत में मुस्लिम दलित जातियों के आरक्षण और पिछड़े वर्गों के अधिकारों से जुड़ी पांच सूत्रीय मांगें उठाईं। उन्होंने कहा कि इन मांगों को गंभीरता से नहीं लिया गया तो संगठन प्रदेशभर में आंदोलन करेगा।
1950 के राष्ट्रपति आदेश को हटाने की मांग
नुरूल हूदा ने संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के धार्मिक प्रतिबंधों का उल्लेख करते हुए कहा कि 10 अगस्त 1950 को जारी राष्ट्रपति आदेश के कारण मुस्लिम और ईसाई दलित समुदायों को अनुसूचित जाति के दर्जे से वंचित रखा गया। उन्होंने कहा कि वर्ष 1956 में सिख समुदाय और 1990 में बौद्ध समुदाय के लिए संशोधन किए गए, लेकिन मुस्लिम और ईसाई दलित जातियों को अब तक इस दायरे में शामिल नहीं किया गया है।
उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मांग की कि यदि सरकार पसमांदा समाज के उत्थान को लेकर चिंतित है, तो संविधान के अनुच्छेद 341(3) के तहत लागू धार्मिक प्रतिबंध को हटाने की दिशा में कदम उठाए।
बिहार में हुई पहल का किया उल्लेख
नुरूल हूदा ने अपने वक्तव्य में बिहार में इस मुद्दे पर हुई राजनीतिक और संवैधानिक पहल का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि अप्रैल 1999 में बिहार विधान परिषद में शकील अहमद खान ने संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 को हटाने का सवाल उठाया था। उनके अनुसार, जुलाई 2000 में लालू प्रसाद द्वारा गैर-सरकारी प्रस्ताव लाया गया, जो ध्वनिमत से पारित हुआ। इसके बाद 5 दिसंबर 2000 को राबड़ी देवी सरकार ने अरज़ाल मुस्लिम समुदाय को अनुसूचित जाति का दर्जा देने के संबंध में केंद्र सरकार को सिफारिश भेजी थी। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश की तत्कालीन मुलायम सिंह यादव सरकार ने भी इस संबंध में सिफारिश भेजी थी।
PDA और राजनीतिक भागीदारी पर उठाए सवाल
नुरूल हूदा ने समाजवादी पार्टी के PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) की अवधारणा पर सवाल उठाते हुए कहा कि पसमांदा और मुस्लिम दलित जातियों की संवैधानिक भागीदारी तथा राजनीतिक प्रतिनिधित्व के मुद्दे पर भी स्पष्ट रुख सामने आना चाहिए।
उन्होंने समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव से सवाल किया कि पसमांदा समाज के वोटों के समर्थन के बावजूद राज्यसभा और लोकसभा में इस समुदाय को पर्याप्त प्रतिनिधित्व क्यों नहीं मिल रहा है। उन्होंने दावा किया कि मुस्लिम दलित समुदाय की 17 जातियों में से किसी को भी राज्यसभा, लोकसभा, विधान परिषद या विधानसभा में प्रतिनिधित्व नहीं मिला है।
हूदा ने कहा कि उनकी आवाज केवल समाजवादी पार्टी तक सीमित नहीं है, बल्कि वे सभी धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दलों से इस मुद्दे पर अपना रुख स्पष्ट करने की मांग कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि राजनीतिक भागीदारी और हिस्सेदारी पर चर्चा को चुनावी समर्थन से अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए।
राष्ट्रीय उलेमा काउंसिल की पांच सूत्रीय मांगें
नुरूल हूदा ने सरकार के सामने निम्नलिखित पांच मांगें रखीं—
1. संविधान के अनुच्छेद 341(3) के तहत 10 अगस्त 1950 से लागू धार्मिक प्रतिबंध हटाया जाए।
2. मुस्लिम दलित जातियों के शैक्षणिक, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विकास के लिए अरज़ाल आयोग का गठन किया जाए।
3. मुस्लिम पमरिया/पमरिया समेत अन्य छूटी हुई जातियों को उत्तर प्रदेश की OBC सूची में शामिल किया जाए।
4. उत्तर प्रदेश की अन्य पिछड़ा वर्ग सूची में बिहार की तर्ज पर कर्पूरी फार्मूला लागू किया जाए।
5. OBC के 27 प्रतिशत आरक्षण में से मुस्लिम OBC के लिए 8.44 प्रतिशत कोटा अलग किया जाए।
मांगें पूरी न होने पर आंदोलन की चेतावनी
नुरूल हूदा ने कहा कि संगठन इन मांगों को लेकर सरकार और राजनीतिक दलों से संवाद चाहता है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि मांगों पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया तो राष्ट्रीय उलेमा काउंसिल प्रदेशभर में आंदोलन करेगी।
नुरूल हूदा
प्रदेश अध्यक्ष, यूथ राष्ट्रीय उलेमा काउंसिल (RUC)
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